जयेष्ठ के महीने की भोर में कहीं भी खड़े होने पर कोयल की कूक सुनाई देती है, जो उस सुबह को सुहावनी बना देती है। हमारा कान उस मधुर आवाज को सुनते ही दिल में सुकून पहुंचाता है। हमारे भारतीय वाद्य यंत्र भी कुछ ऐसे ही हैं जिसकी आवाज संगीत को रसमय और अनुशासित बनाते हैं। आपने पारंपरिक वाद्य यंत्र बांसुरी के बारे में सुना होगा, इस बांसुरी को सुनते ही सबसे पहले ध्यान आता है माखन चोर कृष्ण का! वैसे तो बांसुरी और कान्हा की कहानियां प्रचलित है, बांसुरी विश्व के प्राचीनतम सूषिर (मतलब वह वाद्य यंत्र जिसको मुंह की भूख से बजाया जाए )हालांकि इन सुषिर यंत्रों में एक शंख इकलौता है जो समुद्र से प्राप्त होता है। बांसुरी लोक जन में अनेक नामों से प्रचलित है बांसुरी वेणु, वंशी, मुरलिया इत्यादि यह बांसुरी ही है! जो कृष्ण (भगवान विष्णु के 16 अवतार में से एक अवतार )है। यह बांसुरी ही है जो कृष्ण के होठों से सटकर सुरीली धुन देकर कृष्ण को अनेक अनेक नामों से सुसज्जित करती है।
वैसे बांसुरी की भिन्न-भिन्न लंबाई देखने को मिलती है लेकिन लंबी बांसुरी का महत्व शास्त्रीय संगीत में ज्यादा होता है प्रायःलोक संगीत में 20 से 30 सेंटीमीटर की बांसुरी देखने को मिल जाती.......