समय परिवर्तनशील है लेकिन कुछ यादें, व्यक्ति, एहसास, समय के साथ नही मिटते बल्कि बढ़ते चले जाते है। आज हम 21वीं सदी में है , महिलायें बहुत आधुनिक हो गयी हैं। अपने हिसाब से अपने व्यवसायिक क्षेत्र का चुनाव कर सकती हैं, लेकिन सूरज जैसे बादलों से घिरे होने के बावजूद अपना परिचय देता है, वैसे ही कुछ महिलायें विपरित परिस्थितियों में होने के बावजूद अपनी अद्वितिय प्रतिभा से समाज को एक नया आयाम दिया। ऐसे ही महिलाओं में एक प्रतिभा की धनी जानकी बाई इलाहाबादी का नाम आता है, इन्होने शस्त्रीय संगीत में अपना परचम लहराया।
जानकी बाई का जन्म सन् 1800 वाराणसी में हुआ था। इनके पिता शिव बालकराम एवं माता मानकी देवी थी। इनके पिता ने जानकी बाई और इनकी माता को छोड़ दिया था, इनकी माता ने वाराणसी का अपना घर बेच दिया और इलाहाबाद आ गयी, इलाहाबाद में किसी व्यक्ति द्वारा उन दोनों को कोठे पर बेच दिया गया। कहावत है पूत के पाँव पालने में ही दिख जातें है इसी तरह जानकी बाई की गायकी की अलौकिक प्रतिभा बहुत छोटी उम्र में ही उनकी माता समझ गयीं और जानकी बाई के लिये गायकी प्रशिक्षक नियुक्त किया जिससे उनकी प्रतिभा और निखरी।
जानकी बाई के चेहरे पर छप्पन बार चाकू से चार किया गया जिससे उनके चेहरे पर चाकू के निशान रह गये, वहीं से जानकी बाई के नाम के साथ छप्पनछूरी जुड़ गया। इतना होने के बाद भी उनका गायकी का जूनून नही गया , वो घुंघट डाल कर गाने लगाीं। उनकी आवाज में इतना जादू था कि भारत के कई रियासतों द्वारा उन्हे अपनी गायकी के प्रदर्शन के लिये आमंत्रित किया जाता था। जानकी बाई ने अपनी पहली रिकार्डिग ग्रामोफोन और टाइपरीइटर कम्पनी को दिल्ली 1907 में दी। गौहर खान के साथ जानकी बाई देश की पहली गायिका भीं जिनके डेढ सौ से ज्यादा डिस्क ग्रमोफोन कम्पनी द्वारा बनाये गये। जानकी बाई ने दिल्ली, इलाहाबाद, कोलकता में रिकार्डिग, इनमें ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी,भजन और गजल शामिल थे।
जानकी बाई अपनी गायकी के लिये विश्व में इतनी प्रसिद्व हो गयी साथ ही वह गीत और गज़ल भी लिखा करती थीं। उनकी सारे गीतों को संकलित कर एक किताब "दीवान ए जानकी" इलाहाबाद से प्रकाशित की। इनके गाये गानों को राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुन्दरम्। अपने लिखे गीतों की धुन भी वो खुद ही बनाती थीं।
उनके कुछ प्रसिद्व गीत - राम करे कहीं नैना ना उलझे, यार बोली न बोलो चले जायेगे, नाही परत मोहे चैन, प्यारी सूरत दिखला जा, एक काफिर पे तबियत आ गयी, रुम झूम बदरवा बरसे, मैं भी चलूंगी तेरे साथ, और कान्हा ना कर मोसे रार।
अपनी तमाम जवानी संगीत को समर्पित करने के बाद बढ़ती उम्र में जानकी ने इलाहाबाद के एक वकील से शादी की लेकिन वह रिश्ता जल्द ही टूट गया। उनके जीवन का शेष भाग सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित हो गया। 1934 में उनकी मौत हुई। वह समय रसूलन बाई जैसी गायिकाओं के उत्कर्ष और बेगम अख्तर जैसी गायिका के उदय का था। उनकी मृत्यु के साठ साल बाद एच.एम.वी ने 1994 में ’चेयरमैन्स चॉइस’ श्रृंखला के अंतर्गत उनके कुछ गीतों के ऑडियो ज़ारी किए थे जिन्हें सुनने वाले संगीत प्रेमियों की संख्या आज भी कम नहीं है।
उनका संघर्ष अपने आप में बेमिसाल था, एक ऐसी मलिा जिनको समाज ने कोठे की तरफ ढ़केल दिया, इतनी ज्यातीय व अत्याचारों के बाद भी वह प्रतिभा रंग लायी और समाज में यह संदेश दिया कि पीड़ा व संघर्ष से जो प्रतिभा निकलती है वो अपने आप में निराली होती है। जिनके अंदर विशेष प्रतिभायें होती है उनकी कला को कोई छुपा नही सकता, कुदरत की शक्ति एक विशेष हौसले के रुप में उनके साथ रहती है। अनेकों धाव सहकर भी जो प्रतिभा उन्होने समाज के सामने पेश की वह यह प्रेंरणा देती है कि कठिनाईयां चाहे कितनी भी हो, अगर हम ठान लें तो कोई भी उस व्यक्ति या महिला की प्रतिभा को मिलने से नही रोक सकता। छप्पनछुरी से बड़ा उदाहरण महिलाओं के लिये शयद ही कोई हो। उस समय महिलाओं के प्रति समाज की उदासीनता से टकराते हुए अपने जज्बे को कायम रखते हुए अपने आपको गायकी के क्षेत्र में जो साबित किया, उनकी स्मृति एक नयी प्रेरणा देती है।