सोनचिरैया

ढोला गायकी

0 | 30 Aug 2022
ढोला गायकी

आपने सुना होगा कोस कोस पर बदले पानी कोस कोस पर वाणी!  क्योंकि जितनी बार सुनेंगे लोक संस्कृति के बारे में, हर बार कुछ नया सुनने को मिलेगा।  आप उत्तर प्रदेश को देख लीजिए इस राज्य की सीमा 9 राज्यों की सीमा से लगती है सीमा से लगने का अर्थ है वहां की संस्कृति का भी शामिल होना उत्तर प्रदेश की अपनी संस्कृति है तो है ही लेकिन जैसे-जैसे आगे चलते हैं उनका व्यवहार ,वाणी, पानी, खाना, संस्कृति सब बदल जाती है सोनचिरैया आपको पश्चिमांचल क्षेत्र की एक नई लोक गायकी के बारे में बतायेगी।  ढोला उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्र विशेष का एक महाकाव्य है। ढ़ोला के लिए वहां में वहां के लोगों के मन में सम्मान है  इसलिए ढोला को महाकाव्य नाम दिया गया।  ढोला गायकी नल और दमयंती के जीवन पर आधारित कथा है, जो  उत्तर प्रदेश में विशेष छंद एवं लोक रंजक शैली में गाई जाती है जिसकी लय ताल और आवाज थोड़ी तेज होती है। इस लोक कथा को ब्रज क्षेत्र में प्राचीन समय से ही गाया जाता रहा है। यह वीर नल की गाथा है मान्यता है कि वीर नल सतयुग में पैदा हुआ था लेकिन लोक गायक नल को भगवान राम के परिवार का मानते हैं। ढोला गायकी के लोक गायक के नजर में वीर नल उनका नायक है जिसे लोग गायकों ने  दिल से नायक स्वीकार किया है। जब कोई कथा की भावना दिल से निकलती है तो उसके लोकवाणी छंदों में उसका एक अलग मिठास होती है ,जो लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। इसी तरह जनश्रुति के आधार पर लोककथा परंपरा का हिस्सा बन जाती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी.......

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